दीपावली पर्व की श्रृंखला में नरक चतुर्दशी का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाने वाला यह पर्व केवल दीप जलाने और उत्सव मनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि मनुष्य को बुराइयों, नकारात्मक विचारों और अज्ञान के अंधकार से बाहर निकलने का संदेश भी देता है। इसे छोटी दीपावली के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी नरकासुर का वध किया था और उसके बंदी बनाए गए हजारों लोगों को मुक्त कराया था। इसलिए यह दिन अन्याय और अत्याचार पर धर्म तथा सत्य की विजय का प्रतीक माना जाता है। नरक चतुर्दशी हमें याद दिलाती है कि अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह और ईर्ष्या जैसी बुराइयां व्यक्ति के जीवन को भीतर से कमजोर करती हैं।
तिरंगा अगरबत्ती के निदेशक और समाजसेवी पंडित नरेंद्र शर्मा बताते हैं कि प्रातःकाल सूर्योदय से पहले उठकर तेल और उबटन से स्नान करने की परंपरा है। मान्यता है कि इससे शरीर और मन की नकारात्मकता दूर होती है। घर के बाहर दीपक जलाने की परंपरा भी इसी भावना से जुड़ी है। दीपक केवल घर को रोशन नहीं करता, बल्कि यह प्रतीक है कि जीवन में अंधकार कितना भी गहरा हो, एक छोटी-सी सकारात्मक कोशिश भी प्रकाश का मार्ग खोल सकती है। तिरंगा अगरबत्ती के निदेशक और समाजसेवी पंडित नरेंद्र शर्मा बताते हैं कि आज के समय में नरक चतुर्दशी का संदेश और भी प्रासंगिक है। समाज में बढ़ती हिंसा, तनाव, लालच और आपसी कटुता के बीच जरूरी है कि हम अपने भीतर की नकारात्मकता को पहचानें और उसे दूर करने का प्रयास करें। पर्व की वास्तविक सार्थकता तभी है, जब दीपक की रोशनी हमारे व्यवहार में भी दिखाई दे। तिरंगा अगरबत्ती के निदेशक और समाजसेवी पंडित नरेंद्र शर्मा बताते हैं कि नरक चतुर्दशी इसलिए केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, सदाचार और सकारात्मक जीवन की प्रेरणा है। यह हमें सिखाती है कि बाहरी प्रकाश के साथ मन के अंधकार को मिटाना भी उतना ही आवश्यक है।