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पूर्व अध्यक्षों का कोई मोर्चा नहीं, सिर्फ संगठन को ताकत देने का प्रयासः रवीन्द्र पाटनी

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अंजनी निगम, डीटीएनएन

कानपुर , भाजपा के पूर्व अध्यक्षों की टोली में रवीन्द्र पाटनी के अलावा रामदेव शुक्ल, दिनेश राय, बीना आर्या, विनोद शुक्ल, दीपू पांडेय, सुनील बजाज आदि शामिल हैं। इनकी सक्रियता निश्चित रूप से भाजपा महानगर की राजनीति में कुछ गुल खिलाने वाली है भले ही पूर्व अध्यक्ष इसे किसी तरह का मोर्चा मानने से इनकार करते हुए कहते हैं कि यह तो संगठन को ताकत देने का एक प्रयास है। सभी पूर्व अध्यक्ष संगठन में पूरी तरह से सक्रिय हैं और संगठन के हित में ही विचार करते हैं। इस पूरे मामले में जनसंघ काल से सक्रिय 1985 से 1990 तक भारतीय जनता युवा मोर्चा में अध्यक्ष, 2006 में पार्टी के प्रत्याशी के रूप में नगर निगम का चुनाव जीत कर महापौर बने और 1996 से 2001 तक भाजपा के जिलाध्यक्ष रहे रवीन्द्र पाटनी से हुई बेबाक वार्ता का ब्योर प्रस्तुत है।

प्रश्न – अचानक पूर्व अध्यक्षों का मोर्चा सक्रिय हो गया, ऐसा क्यों ?
उत्तर – नगर की हालत देख कर बहुत समय तक चुप नहीं रहा जा सकता है। पूर्व अध्यक्षों ने किसी तरह का मोर्चा नहीं गठित किया है और न ही हम लोग अचानक सक्रिय हुए हैं बल्कि शहर की समस्याओं और पार्टी के कामों के लेकर हमेशा ही सक्रिय रहे हैं। जब तक जीवन है, तब तक सक्रिय रहेंगे।

प्रश्न – क्या आपको लगता है कि वर्तमान जिलाध्यक्ष और जनप्रतिनिधि समस्याओं के प्रति अनदेखी कर रहे हैं ?


उत्तर – नहीं, वो लोग अपने स्तर पर कार्य कर रहे हैं और हम लोग भी प्रयास कर रहे हैं। भाजपा के जिम्मेदारों में कोई भी जनसमस्याओं की अनदेखी नहीं कर रहा बल्कि सब अपने तरीके से समस्याओं के निराकरण में लगे हैं। सच तो यही है कि हम लोग उन्हें ताकत देने का कार्य कर रहे हैं।

प्रश्न – पिछले दिनों यूजीसी के मुद्दे पर कुछ पूर्व छात्र नेताओं जिनमें अधिकांश भाजपा से जुड़े हैं, के आंदोलन में आप भी शामिल हुए जबकि उस मामले को फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा रखी है, आपकी क्या मांग है ?
उत्तर – मुझे उन युवाओं ने बुलाया था इसलिए भागीदारी करने गया था। आरक्षण के मुद्दे पर अब पुनर्विचार की आवश्यकता है कि किसे, कितना और क्यों आरक्षण दिया जाए। इस मामले पर सभी दलों को बुलाकर व्यापक चर्चा की जानी चाहिए। राजनीतिक दलों को विचार करना होगा कि क्या वे किसी एक वर्ग के वोटों को बूते जीत सकते हैं। वास्तविकता तो यही है कि चुनावों में जीत के लिए सवर्णों का प्रतिनिधित्व करने वाले दलों को दूसरों का और आरक्षित वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वालों को सवर्णों के वोट की जरूरत पड़ती है। मेरा मानना है कि जातिगत आरक्षण को समाप्त कर आर्थिक आधार होना चाहिए। संविधान भी समता मूलक समाज की बात कहता है लेकिन जातिगत आरक्षण से समाज में विद्वेष बढ़ रहा है।

प्रश्न – क्या आप महसूस करते हैं कि आम जन का भाजपा और उसकी सरकार के प्रति विश्वास कुछ कम हुआ है, आखिर क्यों ?
उत्तर – देखिए, ऐसा है कि राजनीति के क्षेत्र में उतार-चढ़ाव तो लगा रहता है। समस्या आते ही जनता की नाराजगी सरकार से हो जाती है और समस्या का समाधान होते ही गुस्सा खत्म भी हो जाता है। मुझे लगता है यूपी में योगी सरकार का कामकाज ठीक है, उनके नेतृत्व में प्रदेश में बहुत सा सुधार और विकास हुआ है। उत्तम प्रदेश बनाने की दिशा में बहुत आगे बढ़े हैं और बढ़ते ही रहेंगे।

प्रश्न – पांच माह बाद विधानसभा के चुनाव हैं, कैसा मुकाबला होने की संभावना है ?
उत्तर – चुनाव तो निश्चित होने हैं लेकिन सामने कोई भी दल मुकाबले में नहीं है। यदि मुकाबले में होते तो जिन समस्याओं को हम लोगों को उठाना पड़ रहा है, उन पर वे आंदोलन कर रहे होते। हम लोग भी विपक्ष में रहे हैं और सशक्त भूमिका निभाई है। विपक्ष के सभी दल अपनी ही उधेड़बुन में लगे हैं।

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