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विद्यालयों की पुकार: 11 माह की फीस प्रतिपूर्ति से टूट रहा निजी स्कूलों का आर्थिक संतुलन
कानपुर। शिक्षा के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत प्रवेश के संबंध में शुक्रवार को अपने संगठन के माध्यम से प्रदेश और अपने जनपद में शिक्षा के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत प्रवेश में विद्यालयों को आ रही विषमताओं के संबंध में निम्नलिखित बिन्दुओं पर विचार करने हेतु प्रार्थना है।
विद्यालयों को केवल 11 महीनों की शुल्क प्रतिपूर्ति की जाती हैं परन्तु विद्यालयों द्वारा शिक्षकों, कर्मचारियों को 12 माह का वेतन एवम् अन्य मदों में जैसे विद्युत बिल आदि करना पड़ता है। अतः विद्यालयों को शुल्क प्रतिपूर्ति पूरे 12 माह की मिलनी चाहिए।
फर्जी आय प्रमाणपत्र और विभागीय दबाव से स्कूल बेहाल, न्याय की मांग तेज
शिक्षा के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत प्रवेश के समय कभी कभी अभिभावकों द्वारा दिए गए प्रमाणपत्रों में त्रुटियां होती हैं और वह विभाग द्वारा भेज दी जाती हैं। विद्यालयों द्वारा जांच करने पर त्रुटियां पाए जाने पर भी विभाग द्वारा दबाव बनाया जाता है की विद्यालयों को प्रमाणपत्र को जांचने का कोई अधिकार नहीं है। इस विषय में विद्यालयों के भी अधिकार पुनरीक्षित करने योग्य हैं। प्रमाण पत्रों में विशेषकर आय प्रमाणपत्र फर्जी बनवाये जाते हैं जिनकी विशेष रूप से जांच करने योग्य है। निजी विद्यालयों के निकट सरकारी प्राइमरी विद्यालयों के स्थित होने के बावजूद निजी विद्यालयों में आरटीई के प्रवेश दिए जाते हैं और सरकारी स्कूल में छात्र संख्या न्यूनतम रहती है।
आरटीई भुगतान में देरी से निजी स्कूल संकट में, बच्चों की शिक्षा और भविष्य दांव पर
सरकारी स्कूलों में निर्धन बच्चों को प्रवेश दिलाने के लिए किसी भी प्रकार के प्रयास नहीं किए जाते हैं। शिक्षा विभाग द्वारा आरटीई के तहत बच्चों की फीस का भुगतान समय पर न होना, जिससे विद्यालयों को आर्थिक तंगी का सामना भी करना पड़ता है। विद्यालयों को आरटीई छात्रों के लिए शिक्षण सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुओं की व्यवस्था करनी होती है, जिसके लिए उन्हें स्वयं ही भुगतान करना पड़ता है, जिससे उन पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ता है। आरटीई से संबंधित छात्र एवं छात्राओं के प्रवेश में पारदर्शिता लाने हेतु विद्यालय संगठनों के पदाधिकारी की सहभागिता रखी जाए |
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