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लखनऊ ही नहीं, पूरा यूपी भुला नहीं पा रहा डॉ दिनेश शर्मा को…

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-डॉ दिनेश शर्मा तो उपराज्यपाल बन गए लेकिन उत्तर प्रदेश के लोगों के ‘दिल में दर्द’ है अपने प्रिय नेता के इतनी दूर जाने का

-विश्वविद्यालय परिसर का वह आवास, जहां हर दिन लगता था जनता दरबार, अब सूना-सूना, गरीब से अमीर और कार्यकर्ता से फरियादी तक बेझिझक पहुंचते थे अपनी बात लेकर डॉ साहब के पास

-अंडमान-निकोबार की नई जिम्मेदारी के बाद लखनऊ ही नहीं प्रदेश के लोगों को बहुत खल रहा अपना ‘दरवाजा’ बंद होना

शैलेंद्र पांडेय, लालू
डीटीएनएन
लखनऊ। कभी यहां आने वालों के कदम नहीं रुकते थे। कोई अपनी समस्या लेकर आता था, कोई उम्मीद लेकर और कोई सिर्फ इसलिए कि अपने नेता से दो मिनट बात हो जाए। विश्वविद्यालय परिसर स्थित वह आवास, जहां डॉ. दिनेश शर्मा के रहते हर दिन लोगों की आवाजाही बनी रहती थी, अब पहले की तरह गुलजार नहीं है। परिसर वही है, रास्ते वही हैं, आवास वही है… लेकिन उस दरवाजे पर दस्तक देने वालों की संख्या बदल गई है। इसी बदलाव को महसूस करते हुए लखनऊ के लोग भावुक होकर कहते हैं दिनेश शर्मा गए, लखनऊ के दिल में दर्द दे गए। डॉ. दिनेश शर्मा को अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह का उपराज्यपाल बनाए जाने के बाद उनकी जिम्मेदारी भले ही लखनऊ से हजारों किलोमीटर दूर हो गई हो, लेकिन शहर में उनके साथ जुड़ी यादें और रिश्ते आज भी मौजूद हैं। राष्ट्रपति सचिवालय ने पांच सितंबर 2026 को उनकी नियुक्ति की घोषणा की थी।

वह दरवाजा, जहां सिफारिश की जरूरत नहीं थी

लखनऊ की राजनीति में डॉ. दिनेश शर्मा की पहचान केवल पद और सत्ता तक सीमित नहीं रही। विश्वविद्यालय परिसर स्थित उनके आवास का एक अलग ही राजनीतिक चरित्र बन गया था। निर्धारित समय पर मिलने आने वालों की आवाजाही रहती और आम कार्यकर्ता से लेकर फरियादी तक अपनी बात रखने की उम्मीद लेकर पहुंचते। किसी को सरकारी काम की समस्या थी, किसी को प्रशासन से शिकायत और किसी को निजी परेशानी। आर्थिक स्थिति कैसी भी हो, लोगों के लिए सबसे बड़ी बात यह थी कि सामने बैठकर अपनी बात कहने का अवसर मिल सकता है। राजनीति में अक्सर नेता और जनता के बीच सुरक्षा, प्रोटोकॉल और औपचारिकताओं की दीवार खड़ी हो जाती है। मगर उनके आवास की पहचान लंबे समय तक इस दूरी को कम करने वाले स्थान के रूप में रही।
डॉ. दिनेश शर्मा का लखनऊ से रिश्ता केवल राजनीतिक नहीं था। शहर के पुराने परिचितों और छोटे-बड़े कारोबारियों के बीच उनके सहज व्यवहार की चर्चा रही है। चाय बेचने वाला हो या मिठाई की दुकान चलाने वाला, व्यापारी हो या सामाजिक कार्यकर्ता—लखनऊ के अनेक लोगों के लिए वह केवल एक राजनीतिक चेहरा नहीं, बल्कि परिचित और आत्मीय व्यक्ति रहे।
यही वजह है कि उनके शहर से दूर जाने का असर सिर्फ भाजपा के राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक सीमित महसूस नहीं होता। उन लोगों को भी उनका जाना खल रहा है, जिनका उनसे राजनीतिक रूप से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था।

प्रदेशभर के कार्यकर्ताओं का भरोसा

लखनऊ भाजपा की राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। प्रदेश के अलग-अलग जिलों से कार्यकर्ता राजधानी आते रहे हैं। इनमें कई ऐसे भी थे, जिनकी पहुंच हर राजनीतिक दरवाजे तक नहीं थी। डॉ. दिनेश शर्मा के यहां पहुंचकर अपनी बात कह पाने का भरोसा ऐसे कार्यकर्ताओं के लिए खास मायने रखता था। मुलाकात हो या फोन पर बातचीत—उनसे संवाद कार्यकर्ताओं के मनोबल का आधार बनता रहा।
अब अंडमान-निकोबार की नई जिम्मेदारी के साथ यह रोजमर्रा का संवाद स्वाभाविक रूप से बदल गया है। यही बदलाव उन कार्यकर्ताओं को भीतर तक महसूस हो रहा है, जिनके लिए विश्वविद्यालय परिसर का वह आवास लखनऊ में एक भरोसे का ठिकाना था।

आवास वही, मगर आवाज नहीं

आज विश्वविद्यालय परिसर के उस आवास को देखकर शायद कोई यह अंदाजा न लगा सके कि कभी यहां रोज कितने लोगों की आवाजाही रहती थी। न कोई लंबी कतार दिखाई देती है, न पहले जैसी चहल-पहल। लेकिन इस खामोशी को सिर्फ किसी आवास के खाली होने से जोड़ना शायद अधूरा होगा। यह उस राजनीतिक संस्कृति के शांत पड़ने का एहसास भी है, जिसमें कोई आम व्यक्ति यह सोचकर राजधानी आता था कि “चलो, दिनेश शर्मा से मिलकर देखते हैं, शायद बात बन जाए।”

एक रिश्ता है प्रदेश से

लखनऊ केवल राजनीतिक कार्यक्षेत्र नहीं रहा। लंबे समय तक शहर की राजनीति में सक्रिय रहने के कारण उनका सामाजिक जुड़ाव भी व्यापक रहा इसीलिए उनके अंडमान-निकोबार जाने के बाद शहर में महसूस हो रहा खालीपन राजनीतिक पद के खाली होने का नहीं, बल्कि एक सहज उपलब्ध चेहरे के दूर हो जाने का है।
एक ओर उन्हें नई संवैधानिक जिम्मेदारी मिलने की खुशी है, दूसरी ओर उनके पुराने शहर में उनसे जुड़े लोगों के बीच दूरी का एहसास भी है।

दूरी हजारों किलोमीटर की, रिश्ता लखनऊ का

अंडमान-निकोबार की जिम्मेदारी अब डॉ. दिनेश शर्मा को एक नए प्रशासनिक और संवैधानिक दायित्व में ले गई है। लखनऊ से भौगोलिक दूरी भले बढ़ गई हो, लेकिन यहां उनके साथ जुड़े रिश्ते एक आदेश से खत्म नहीं हो सकते। विश्वविद्यालय परिसर का वह आवास अब पहले की तरह लोगों से गुलजार नहीं है। फिर भी उसकी दीवारें उन दिनों की गवाही देती हैं, जब यहां कोई नेता से मिलने नहीं, बल्कि अपने आदमी से अपनी बात कहने आता था। शायद इसी कारण आज उस आवास की खामोशी लखनऊ को सामान्य खामोशी नहीं लगती। डॉ दिनेश शर्मा गए हैं… जिम्मेदारी लेकर गए हैं… लेकिन पीछे लखनऊ के दिल में एक ऐसा खालीपन छोड़ गए हैं, जिसे उनके पुराने परिचित और कार्यकर्ता अपने-अपने तरीके से महसूस कर रहे हैं।

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