अंजनी निगम, डीटीएनएन
केजीएमयू से एमबीबीएस और मेडिसिन में एमडी तथा न्यूरोलॉजी में डीएम करने के बाद डॉ नवनीत कुमार ने 1989 में जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग में लेक्चर के रूप में ज्वाइन करने के बाद से ही कॉलेज में न्यूरोलॉजी विभाग खोलने के लिए प्रयास किए। 2009 में मेडिसिन विभाग में एचओडी बनने के बाद उनके प्रयास तेज हो गए और 2012 में कॉलेज के प्राचार्य तथा डीन बने और बाद में 2018 में कन्नौज मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य बने और 2022 में रिटायर हुए। जीएसवीएम में अपने कार्यकाल के दौरान न्यूरोलॉजी, ब्लड बैंक, मेटरनिटी विंग, पीडियाट्रिक में एऩआईसी आदि कई बिल्डिंगें बनवाने का कार्य किया। ऑटिस्टिक बच्चों की बढ़ती संख्या को देखते हुए जागरूकता बढ़ाने के लिए हर साल दो अप्रैल को वर्ल्ड ऑटिज्म डे मनाया जाता है। प्रस्तुत है डॉ नवनीत कुमार से ऑटिज्म पर हुई वार्ता के प्रमुख अंश |
प्रश्न – ऑटिज्म क्या है और यह किस उम्र में शुरु होती है ?
उत्तर – ऑटिज्म एक प्रकार की न्यूरो संबंधी बीमारी है जो एक साल से लेकर दो साल की उम्र में सामने आ जाती है। इसमें एक टर्म आता है ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) जिसमें स्पेक्ट्रम का अर्थ है मामूली से लेकर गंभीर अवस्था। बच्चों की पैदाइश का एक प्रतिशत इससे ग्रस्त होते हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार यह दो फीसद तक भी हो सकता है। यह समस्या लड़कियों के मुकाबले लड़कों में अधिक होता है। यदि चार बच्चे पीड़ित हैं तो उनमें तीन लड़के और एक लड़की होगी।
प्रश्न – क्या ऑटिज्म अनुवांशिक होता है ?
उत्तर – जी हां, यदि किसी परिवार में किसी एक बच्चे को यह समस्या है तो दूसरे बच्चों में 70 से 80 फीसद संभावना बढ़ जाती है। उन परिवारों में भी यह समस्या देखने में आती है जहां युवक युवतियों का विवाह देर से होता है और बच्चे भी देर से होते हैं। बच्चे के जन्म के समय उसके देर से रोने, चोट लगने या इन्फेक्शन होने की स्थिति में यह समस्या हो सकती है।
प्रश्न – ऑटिज्म के लक्षण क्या होते हैं, इसे कैसे पहचाना जाता है ?
उत्तर – पहचान के प्रमुख चार लक्षण हैं जिनसे पता लगता है कि बच्चा ऑटिस्टिक है। सोशल कम्युनिकेशन प्रभावित होता है, सामान्य तौर पर छह माह का बच्चा स्माइल करने लगता है। नौ माह की अवस्था में बच्चे शोर मचाने लगते हैं। इस उम्र में बच्चा यदि स्माइल न दे, आंख में आंख देख कर बात नहीं कर पाना, देर से बोलना शुरु करना या इमोशन को न समझ पाना तो ऑटिज्म हो सकता है। रिपीटेड बिहैवियर यानी बच्चा यदि एक ही कार्य को बार-बार करता है जैसे ताली बजाना या खिलौनों को एक लाइन में लगाना आदि। आवाज, स्पर्श और रोशनी से हाइपर सेंसटिविटी होना भी एक लक्षण है ऐसा होते ही बच्चे का रिएक्शन असामान्य हो जाता है। चौथा बच्चे का इंटीलेक्चुअल डेवलपमेंट न होना अर्थात मंदबुद्धि हो जाना। एक और महत्वपूर्ण बात है कि ऑटिस्टिक बच्चों में 30 से 40 फीसद मिर्गी के शिकार हो जाते हैं।
प्रश्न – ऑटिज्म बच्चों की जांच करने की क्या विधि है ?
उत्तर – इसके लिए सीटी स्कैन या एमआरआई से कुछ नहीं पता लगता है बल्कि स्पीच थिरैपिस्ट या बिहैवियर थिरैपिस्ट बच्चे के बोलने और एक्टिविटी से पता लगाते हैं। इसके लिए उनके पास अलग-अलग चार्ट और स्केल होते हैं जिनसे मापन किया जाता है। इन बच्चों का टेस्ट साइकोलॉजिस्ट करते हैं।
प्रश्न – इन बच्चों का ट्रीटमेंट किस तरह से किया जाता है ?
उत्तर – ऑटिस्टिक बच्चों के ट्रीटमेंट के लिए कोई दवा या इंजेक्शन नहीं है बल्कि ऐसे बच्चों के लिए साइकोलॉजिस्ट एप्लाइड बिहैवियर एनालिसिस (एबीए) के माध्यम से पता लगाते हैं कि बच्चे में किस स्तर का ऑटिज्म है, सामान्य, मध्यम या गंभीर। इसके आधार पर ही थिरैपी दी जाती है। साइकोलॉजिस्ट ही बच्चे की विशेषता जैसे पेंटिंग करना, स्वीमिंग करने आदि का पता लगा कर उस दिशा में आगे बढ़ाने के लिए अभिभावकों को प्रेरित करते हैं। जो बच्चे माइनर ऑटिज्म होते हैं वो कुछ समय की बिहैवियर थिरैपी के बाद सामान्य बच्चों की तरह ही पढ़ाई-लिखाई खेलकूद और युवा होने पर विवाह आदि कर सकते हैं।
प्रश्न – ऐसे बच्चों के अभिभावकों के लिए क्या संदेश है ?
उत्तर – सबसे अच्छा है कि बच्चों का जन्म मां को 30 वर्ष की अवस्था तक कर लेना चाहिए। बच्चे का जन्म अस्पताल में अच्छी चिकित्सक की देखरेख में होना चाहिए। डिलीवरी के समय यदि सर्जरी की जरूरत है तो देर नहीं करना चाहिए और बच्चे के जन्म के समय उसके रोने आदि को ठीक से समझना चाहिए। जन्म के समय यदि किन्हीं कारणों से हाइपोक्सिया हो गया तो वह मिर्गी अथवा ऑटिज्म या ब्रेन हैम्रेज का शिकार हो जाता है। बच्चे के जन्म के बाद माता-पिता को उसकी ग्रोथ, गर्दन घुमाना, आंख का एक्शन आदि को गंभीरता से देखना चाहिए।